मारीच के जीव के पास द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव उत्कृष्ट थे। पर 5वाँ निमित्त भाव, जघन्य था।
यह भाव इतना शक्तिशाली होता है कि वह चारों को निष्क्रिय कर देता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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मुनि श्री सुधासागर महाराज जी ने भाव को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए विशुद्ध भाव रखना परम आवश्यक है।
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मुनि श्री सुधासागर महाराज जी ने भाव को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए विशुद्ध भाव रखना परम आवश्यक है।