वैराग्य
कहा है कि संसार को देखकर वैराग्य होता है पर हमको हो क्यों नहीं रहा ?
क्योंकि हम संसार में रूप देखते हैं जिससे राग बढ़ता है, उसका स्वरूप नहीं देखते।
वैराग्य की चिनगारी उठती तो है पर उसे लगातार ईंधन नहीं मिलता, इसलिए बुझ जाती है। सत्संग/ गुरु का सान्निध्य मिलता रहे तो वैराग्य भी बना रह सकता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड – 9 मई)




One Response
वैराग्य को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए वैराग्य के भाव आना परम आवश्यक है।