शिष्य / गुरु
आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा….
आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ?
सूखे पत्ते सा।
वो कैसे ?
सुखे पत्ते की अपनी कोई इच्छा/ मंज़िल नहीं होती,
गुरु रूपी हवा जिधर ले जाती है, उधर चला जाता है।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा….
आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ?
सूखे पत्ते सा।
वो कैसे ?
सुखे पत्ते की अपनी कोई इच्छा/ मंज़िल नहीं होती,
गुरु रूपी हवा जिधर ले जाती है, उधर चला जाता है।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
2 Responses
आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी ने शिष्य/गुरु का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु शिष्य को गुरु के साथ समपर्ण भाव रखना एवं अपनी इच्छाओं एवं मंजिल के भाव गुरुजनों के अनुसार चलना परम आवश्यक है।
Acharya Shri ke charno me shat shat naman !