स्वाध्याय
श्रावकों के लिये प्राचीन शास्त्रों का स्वाध्याय करने को नहीं कहा, यह तो मुनियों के लिए था। श्रावकों को तो पूजा, आरंभिक हिंसा तथा परिग्रह के प्रक्षालन के लिए दान कहा है।
आगम में चक्रवर्ती आदि के पूजा/ दान करने के विवरण तो बहुत आए हैं, स्वाध्याय करने का विवरण कहीं नहीं आया है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी



