शिष्य / भक्त
आचार्य श्री विद्यासागर जी अपने शिष्यों और भक्तों को सिंह बनाते थे, इसलिए हंटर जैसा अनुशासन रखते थे, श्वान नहीं जिसको पट्टा डालकर घुमाया जाए।
भिखारी*, व्यापारी** नहीं, पुजारी*** बनाते थे।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड-गा.229 – 22 मई)
* हमेशा मांगने वाला।
** देने के बदले लेने की इच्छा रखने वाला।
***जो सिर्फ़ देना/ भक्ति करना जानता हो।




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शिष्य एवं भक्त का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः सच्चा भक्त वही होता है कि वह भक्ति करना जानता हो एवं देने के भाव रखना आवश्यक है। शिष्य एवं भक्त मै अनुशासन होना परम आवश्यक है।