Month: June 2025

साक्षात

मंदिर में भगवान की मूर्ति के सामने एक मिनट भी ध्यान लगाना मुश्किल होता है। जबकि मुनिराज को आहार देते हुए पूरे समय ध्यान भटकता

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पुण्य

पुण्य का त्याग कैसे करें ? इतना कितना पुण्य जमा कर लिया है कि त्याग करना चाहते हो/ त्याग करने की नौबत आ गयी ?

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दिव्यध्वनि

सिद्धांत ग्रंथों में दिव्यध्वनि को भी संशयी कह दिया। पर दिव्यध्वनि तो संशयी हो ही नहीं सकती। पात्र संशयी होते हैं और जब दिव्यध्वनि उस

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रावण

क्या रावण को धर्मात्मा कहें क्योंकि वह विद्वान के साथ-साथ पूजा/पाठ भी बहुत करता था ? लेकिन उसका उपयोग सीता जी में था इसलिए वह

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श्रुतज्ञान

प्रथमानुयोग ज्ञान का विषय है, श्रुतज्ञान का नहीं। आज मन (श्रुत) का विषय तो विषय/ भोग बन गये हैं। इसलिये धर्म का ज्ञान अनुगामी नहीं

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तप

सोना तप कर शुद्ध, चमकदार ही नहीं अपनी अकड़ छोड़ मुलायम हो जाता है। यदि हम तपने से घबराते हैं तो अपने को सोना नहीं,

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ऐलक जी

ऐलक जी को संबोधन/ सम्मान “इच्छाकार” कह कर करना चाहिए। मुनि श्री मंगलानंद सागर जी

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ग्रहण/ त्याग

इंद्रियों आदि के कार्य… सिर्फ़ ग्रहण करते हैं… कान, आँख, नाक, रसना, स्पर्श इंद्रियां, माथा(आशीर्वाद), पैर (मंजिल) सिर्फ़ त्याग करते हैं… फेफड़े (गंदी हवा) ग्रहण

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विपाक विचय

विपाक विचय धर्मध्यान करने का सबसे सरल तरीका है – स्वयं सथा अन्य जीवों के दुखों के कारणों का चिंतवन करना। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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तीन काल

भूतकाल Experience, वर्तमान Experiment(Based on Experience) , भविष्य Expectation. वर्तमान अपना, अपनाते नहीं, Feel करें; भूत और भविष्य Fail करें। मुनि श्री सौम्य सागर जी

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मंगल आशीष

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June 10, 2025