उत्तम सत्य
उपगूहन और स्थितिकरण के बिना सत्य के दर्शन नहीं हो सकते।
क्रोध के अभाव में क्षमा प्रकट होती है, मान के अभाव में मार्दव, मायाचारी के अभाव में आर्जव और लोभ के अभाव में शौच धर्म प्रकट हो जाता है। लेकिन सत्य चारों के अभाव से प्रकट होता है।
आज तो सामने वाले को बर्बाद करने के लिए, खोटी आयुबंध करने के लिए भी व्यक्ति तैयार हो जाता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 सितम्बर)



