चाहत
हम धनादि/ पुत्रादि से ज्यादा अपने को चाहते हैं। जैसे दर्पण को नहीं, उसमें अपने को देखते हैं, दर्पण को तो निमित्त बना लेते हैं।
क्षु. सहजानन्द जी
हम धनादि/ पुत्रादि से ज्यादा अपने को चाहते हैं। जैसे दर्पण को नहीं, उसमें अपने को देखते हैं, दर्पण को तो निमित्त बना लेते हैं।
क्षु. सहजानन्द जी
One Response
जीवन के कल्याण के लिए चाहत सिर्फ अपनी आत्मा पर केन्द्रित रखना एवं श्रद्भान रखना परम आवश्यक है।