Month: April 2026
उत्पाद / व्यय / ध्रौव्य
उत्पाद = जन्म, पैदाइश व्यय = नाश, ख़र्च ध्रौव्य = नित्यता, स्थिरता मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
राग
देह को तो राख बनना ही है। तो क्या राख से राग रखना समझदारी होगी ! आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
एकल विहार
दो मुनि साथ रहकर भी सारी क्रियायें अलग-अलग कर रहे हों तो भी भगवान की आज्ञा (एकल विहार नहीं कर रहे) मानने से असंख्यात गुणी
दान / त्याग
दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिये। त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिये। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
साधना
सिद्धि के लिये साधना होती है। लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिये होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती
मूर्तिक / अमूर्तिक
पुद्गल ही मूर्तिक है, बाकी सब द्रव्य अमूर्तिक हैं। संसारी जीव कर्म-वर्गणाओं (पौद्गलिक) सहित सो मूर्तिक, कर्म-रहित (सिद्ध) अमूर्तिक।
वाकपटुता
नया व्यक्ति गाँव में पहुँचा। पूछा –> यहाँ के लोग कैसे हैं ? मैं ही ईमानदार हूँ (पूरे गाँव के बारे में कथन हो गया)।
अनुजीवी
“अनु” = अनुरूप/ उनमें हमारे प्राण। “जीवी” = जीवित रहने वाले/ जीवन, अस्तित्व इन्हीं से चलता है। प्रतिजीवी शरीर के। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ
संस्कार
वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ/ दिमाग शिथिल हो जाते हैं। जिन चीज़ों में पहले से रुचि है वही आगे बढ़ जातीं हैं। यदि खाने में तो खाते
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