रूपी / मूर्तिक

1. आत्मा –> रुपी संसारी की, रुपी/ अरुपी केवलज्ञानी का विषय। अमूर्तिक(निश्चित आकार नहीं)।
सिद्ध –> अरुपी, अमूर्तिक … केवलज्ञानी का विषय।
2. विषयभोग –> रूपी क्योंकि पौद्गलिक, मूर्तिक भी।
3. काल/ धर्म/ अधर्म –> मूर्तिक क्योंकि आकार निश्चित, अमूर्तिक क्योंकि स्पर्श आदि नहीं।
आकाश –> अमूर्तिक (अनन्त है), अरूपी। केवलज्ञानी को रूपी (दिखने की अपेक्षा)।
पुद्गल –> मूर्तिक, रूपी। सूक्ष्म-पुद्गल प्रत्यक्षज्ञानी का विषय, स्थूल-पुद्गल मति/ श्रुतज्ञानी का विषय।

चिंतन

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4 Responses

  1. रुपी/ मूर्तिक को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।

  2. 1) ‘स्थूल-पुद्गल’ मति/ श्रुतज्ञानी का विषय kaise hai ?
    2) ‘प्रत्यक्षज्ञान’ kaunse ज्ञान ka part hota hai ?
    In 2 points ko clarify karenge, please ?

    1. 1) स्थूल-पुद्गल रूपी तथा मूर्तिक इसलिए परोक्ष/ मति श्रुत ज्ञान का विषय बनता है।
      2) अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान।

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