Category: वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर

भविष्य

हम जिस तरह आज जीते हैं, उसी तरह आगे के जीने के लिये भी हम तैयारी कर लेते हैं । (इस जन्म में तथा अगले

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परवाह

अभी मुझे और धीमे कदम रखना है, अभी तो चलने की आवाज़ आती है । “अपना घर” – मुनि श्री क्षमासागर जी

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दान

दान देने की planning मत करो, दान देने की आदत बना लो । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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दान

एक कंजूस सेठ थे। धर्म सभा में आखरी पंक्ति में बैठते थे। कोई उनकी ओर ध्यान भी नहीं देता था। एक दिन अचानक उन्होंने भारी

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केवलज्ञान

एक चित्रकार था दूसरा विचित्रकार( विचित्र चित्रकार), दोनौं में competition हुआ – एक हाल की एक दीवार चित्रकार को दी गयी और दूसरी विचित्रकार को । 

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दौलत

दो लात मारे वह दौलत । जब दौलत आती है तब सीने पर लात मारती है, सीना फूल जाता है । जब जाती है तब

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अहंकार

हीनता का भाव भी अहंकार पैदा करता है । दूसरे के सम्मान में अपना अपमान मानना भी अहंकार है । मुनि श्री क्षमासागर जी

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मंगल आशीष

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