Tag: अभिमान
स्वाभिमान/अभिमान
स्वाभिमान में अपना तथा दूसरे का मान, अभिमान में अपना मान तथा दूसरे का अपमान । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अभिमान
हैसियत का कभी अभिमान न करना, उड़ान ज़मीं से शुरू और ज़मीं पै ही खत्म होती है । (सुरेश)
अभिमान / स्वाभिमान
मोह में स्वाभिमान रह नहीं सकता । अभिमान को ही स्वाभिमान मान लेते हैं । सम्मान की इच्छा रखना अभिमान है, ऐसे कार्यों से बचना, जिससे
स्वाभिमान/अभिमान
इंसान के अंदर जो समा जाये , वो “स्वाभिमान” और जो इंसान के बाहर छलक जाये , वो “अभिमान” (ड़ॉ. अमित)
अभिमान
यह सजीव में ही नहीं, निर्जीव में भी पाया जाता है । जैसे कपड़े, मुर्दे, आँख, नाक आदि की देखभाल ना करो तो वे बदबू/दर्द
अभिमान
श्रीमति राधाबाई* ने एक दिन बहुत अच्छी मालिश की । मैंने उसकी बहुत प्रशंसा कर दी, तो बाई नाराज़ हो गयी । कारण ? बाई
अभिमान/स्वाभिमान
अभिमान किसी को ऊपर उठने नहीं देता, और स्वाभिमान किसी को नीचे गिरने नहीं देता । (श्री स्वप्नेश सुराणा)
अभिमान
जो मानता स्वंय को सबसे बड़ा है, वह धर्म से अभी बहुत दूर खड़ा है । आचार्य श्री विद्यासागर जी
अभिमान
अपनी बुलंदियों पर इतना नाज़ न करो, हमने तो सितारों को टूटते हुए देखा है ।
अभिमान
इंसान भी कितना अजीब प्राणी है, उसको अपने ‘ज्ञान’ का ‘अभिमान’ तो होता है लेकिन अपने ‘अभिमान’ का ‘ज्ञान’ नहीं होता । (ड़ा. सुधीर)
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