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पुण्य के उदय में पाप भाव
पुण्य के उदय में पाप भाव कैसे ? मिथ्यात्व के साथ पूर्व में पुण्य कमाया हुआ, पाप कराने का भाव कराता है ।
भाव
नाटक की परिभाषा – बिना भाव की क्रिया । क्या हम भी धार्मिक क्रियायें ऐसे ही तो नहीं कर रहे हैं ?
भाव / क्रिया
क्रिया साँचा है, भाव मूर्ति, विडंबना यह है कि हम साँचे को ही मूर्ति मानना शुरू कर देते हैं । (विपुल-फरीदाबाद)
भाव
दुकानदार माल से मालदार नहीं, भावों से मालदार बनता है । आचार्य श्री विद्यासागर जी
भाव
भाव सहित बिना माला (उँगलियों पर) के भी मालामाल हो सकते हैं । भाव रहित सोने की माला फेरने से भी सूने रह सकते हैं
भाव / क्रिया
इन दोनों में महत्त्वपूर्ण कौन ? गुरू पर Attack करने वाले से बचाने वाला युद्ध करता है – क्रिया दोनों Same, पर भाव अलग अलग;
भाव
दोषी को दोषी माना तो द्वेष होगा, दोषी को रोगी मानो, सहानुभूति होगी/भाव सुधरेंगे । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी
भाव / अभाव / प्रभाव
कोई भी व्यक्ति आपके पास तीन कारणों से आता है ! भाव से,अभाव से या प्रभाव से । यदि भाव से आया है तो उसे
प्रभाव
धर्म का प्रभाव क्यों नहीं हो रहा ? क्योंकि हम जीवन में धर्म का अभाव महसूस नहीं करते हैं , इसलिये धर्म जानने/ समझने के
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