Tag: पुरूषार्थ

पुरूषार्थ

आजकल पुरूषार्थ व्यायाम करने वाली साइकिल जैसा है , चलाते चलाते, पसीना पसीना हो जाते हैं पर पहुंचते कहीं नहीं । मुनि श्री सौरभसागर जी

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पुरूषार्थ

साधु को जंगल में एक बूढ़ी लोमड़ी दिखाई दी, जिसके चारौ पैर नहीं थे, साधु परेशान – ये ज़िंदा कैसे है? खाती कैसे है? इतने

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धर्म-पुरूषार्थ

शुभ सरस्वती है तथा लाभ लक्ष्मी है । पर हम सब लाभ ही लाभ के पीछे लगे रहते हैं । शुभ बढ़ा लो ( अपने

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पुरूषार्थ

पुरूष ( आत्मा ) के द्वारा किया गया कार्य, जिसका अर्थ व्यर्थ ना हो । श्री लालमणी भाई

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भाग्य/पुरूषार्थ

जो सहजता से मिले, वह भाग्य। जो मेहनत से मिले, वह पुरूषार्थ।। आर्यिका श्री प्रज्ञामति माताजी

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पुरूषार्थ

भगवान का पराक्रम/पुरूषार्थ दूसरों की सहायता से रहित होता है। जैसे तलवारबाजी में माहिर, हवा में गज़ब के पैंतरे दिखा रहा हो, ना तो किसी

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पुरूषार्थ

एक बेटी ने कहा- आज भगवान ने मेरी इच्छा पूरी कर दी। उसके छोटे से भाई(रेयन) ने कहा – ये सही नहीं है, आज परीक्षा में मुझे

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मंगल आशीष

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