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कर्तृत्व
कर्तृत्व (कर्ता) का भाव, कर्तव्य से विमुख कर देता है । आचार्य श्री विद्यासागर जी
मोह/कर्तव्य
अपनों के लिये किये गये कार्य प्राय: मोहवश होते हैं, दूसरों के लिये किये गये कार्य कर्तव्यवश । चिंतन
कर्तव्य
दो मुख्य कर्तव्य – “एक जीव की जीविका, दूजा जीव उद्धार” । कैद में पड़े इस जीव को भोजन तो जरूरी है सो जीविका, पर
कर्तृत्व/कर्तव्य
कर्तृत्व में कर्ता का भाव है, अहम् है, कर्तव्य में बिना पाने की इच्छा के सेवा भाव है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
कर्तव्य
बच्चों को मैच पर निबंध लिखने को मिला । आलसी बच्चा एक लाईन लिखकर आया -“बारिश की वज़ह से मैच रद्द हो गया ।” हम
कर्तव्य/मज़े
जीवन मज़े के लिये नहीं, कर्तव्य पूरे करने के लिये है । यह दूसरी बात है कि कर्तव्य पूरे करने वाले को ही असली मज़े आते हैं
प्रकृति
प्रकृति का हर काम मंद/सहज है, पर कुछ भी miss नहीं होता । हमारा हर काम तेज/हड़बड़ी में होता है, इसलिये हम आवश्यक काम भी
अधिकार/कर्तव्य
अधिकार तब तक जब तक दूसरे को दु:ख न हो, कर्तव्य तब तक जब तक अपने को दु:ख न हो । मुनि श्री अतुलसागर जी
कर्तव्य
एक दिन सागर ने नदी से पूछा – कब तक मिलती रहोगी, मुझ खारे पानी से ? नदी ने हंसकर कहा – जब तक तुझ
कर्तव्य
एक माँ दूसरे धर्मावलंबियों की Activities में जाने लगीं । उनके बेटे (मेहुल) ने दो – तीन दिन देखा फ़िर पूछा – अपना धर्म कब
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