आत्मा / अनात्मा
प्राय: दूसरों से अधिक से अधिक सुख लेना चाहते हैं। जैसे मिठाई मेरी थाली में है पर Common में से पहले और ज्यादा से ज्यादा लेना पसंद करते हैं/ लेते हैं।
अनात्मा की ओर ही लगे रहते हैं इसीलिये अपनी आत्मा की ओर आ नहीं पाते।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी




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आत्मा एवं अनात्मा को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए स्यमं आमा में ही लीन रहना परम आवश्यक है। अतः दूसरों की अपेक्षा सुख प़ाप्त करने के लिए प़यास करना उचित नहीं है।