उत्तम तप
तप का फल ना मिले तो उसे कोई तपस्वी नहीं मानता। यही तो भर्तृहरि ने मुनी शुभचंद्र जी से पूछा था कि मैंने 12 साल में रसायन पाया, तुमने क्या पाया ?
जिनालय में रात्रि में सज्जन पुरुष नहीं जाते, देव जाते हैं जिनका शरीर वैक्रियिक होता है और आराम की जरूरत नहीं होती, जिनके यहाँ रात्रि और दिन का भेद नहीं होता।
तप हमको व्यसनों से बचाता है। शिक्षा लेनी चाहिए चारुदत्त से जो तद्भव मोक्षगामी थे, युवावस्था तक स्वाध्यायी और धार्मिक थे पर माँ और मामा ने मिलकर उनको जिव्हा की लोलुपता सिखा कर व्यसनी बना दिया, नालियों में पड़े रहते थे।
पड़ोसी(परा+असि यानी “पर हो”) ऐसा कह-कह के हमने पड़ोसी बना लिया पर सबसे करीबी पड़ोसी तो मेरा शरीर है और उसके लिए मैंने कितने अपराध कर डालें !
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 3 सितम्बर)



