ग्रहण/ त्याग

इंद्रियों आदि के कार्य…
सिर्फ़ ग्रहण करते हैं… कान, आँख, नाक, रसना, स्पर्श इंद्रियां, माथा(आशीर्वाद), पैर (मंजिल)
सिर्फ़ त्याग करते हैं… फेफड़े (गंदी हवा)
ग्रहण भी और त्याग भी… मन के द्वारा हालांकि अच्छी चीजों का कम, बुरी का ज्यादा, हाथ (त्याग करते समय छोटे हो जाते हैं, लेते समय फैल जाते हैं)।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 मार्च)

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6 Responses

  1. ग़हण एवं त्याग का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए इच्छाओं का त्याग करना परम आवश्यक है।

  2. Can meaning of the following line be explained please :
    ‘त्याग करते समय हाथ छोटे हो जाते हैं, लेते समय फैल जाते हैं’ ?

    1. प्रैक्टिकल करके देख…जब देती है तो उंगलियां कैसे कोनिकल शेप में सिमट जाती हैं। लेने के लिए किसी के आगे हाथ फैलाते हैं तो कैसे फैल जाती हैं।

    1. एक शरीर की सब इंद्रियां मेरी होते हुए भी, उनका स्वभाव अलग-अलग। तो अलग-अलग व्यक्तियों के स्वभाव में कितना अंतर आता होगा !

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