हालांकि मिथ्यात्व पहले गुणस्थान तक ही रहता है परंतु दूसरे गुणस्थान में अनंतानुबंधी के सद्भाव में मिथ्यात्व न होते हुए भी मिथ्यात्व जैसा रहता है।
आचरण न होने दे यह क़ुव्वत मिथ्यात्व में नहीं, कषाय में है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 22 अप्रैल)
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दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
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