पैसा
जैसे-जैसे पैसा बढ़ता जाता है, शून्यता भी बढ़ती जाती है(1, 10, 100…..)।
इसीलिए बुजुर्गों ने 11-101 आदि की भेंट शुरू करी ताकि एकता(1) बढ़े।
गौरव – चिंतन
इसलिए ही कहा जाता है… मुर्गी जैसे जैसे मोटी होती जाती है, उसके अंडे वैसे वैसे छोटे होते जाते हैं! यानी जमा में शून्य बढ़ते जाते हैं।………….. जे.पी.शर्मा




One Response
पैसा को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में पैसा कमाना हो स्वयं के लिए एवं दूसरों की आवश्यकताओं के लिए।पैसा कमाने में आशाक्ती से बचना परम आवश्यक है।