भय अपरिचित वस्तुओं, स्थान या व्यक्ति से ही होता है जैसे रस्सी को भी अनजाने में साँप मानने लगते हैं। सबसे अपरिचित आत्मा है इसीलिए हमको उससे सबसे ज्यादा भय आत्मा से ही लगता है।
इसी कारण हम एकत्व, स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर पाए।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 27 मार्च)
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भय को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भय नहीं रहना चाहिए।
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भय को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भय नहीं रहना चाहिए।