आचार्यों के मूलगुणों में 10 धर्म लिए, मुनियों के लिए क्यों नहीं ?
आचार्यों को संघ चलाना होता है। उसमें क्रोध आदि आने की संभावना ज़्यादा होती है। मुनियों को तो अपनी ही साधना करनी होती है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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मूलगुण को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। उपरोक्त कथन सत्य है कि मुनियों के लिए साधना करना परम आवश्यक है। आचार्य अपने समूह के मुनियों को जैन दर्शन की शिक्षा एवं उनके कल्याण को मार्गदर्शन देना परम आवश्यक है।मोक्ष मार्ग पर चलना ही उद्देश्य रहता है।
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मूलगुण को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। उपरोक्त कथन सत्य है कि मुनियों के लिए साधना करना परम आवश्यक है। आचार्य अपने समूह के मुनियों को जैन दर्शन की शिक्षा एवं उनके कल्याण को मार्गदर्शन देना परम आवश्यक है।मोक्ष मार्ग पर चलना ही उद्देश्य रहता है।