श्रावक
आचार्य श्री विद्यासागर जी के दर्शन करने एक धनाड्य व्यक्ति आये।
आचार्य श्री –> सेठ जी आ गये ?
सेठ –> सेठ नहीं महाराज, भक्त।
नहीं, सिर्फ सेठ ही।
समझा नहीं !
क्या आपके घर में शुद्ध भोजन बनता है ? गुरुओं के चरण धोने को शुद्ध प्रासुक जल रहता है?? (या सिर्फ अपार धन ही रहता है)
(राजीव चौधरी – ग्वालियर)



