शुद्ध निश्चय नय से कर्म, कर्म में है, “मैं अपने में” ऐसा ज्ञानी सोचता है। तब उसे सुख-दु:ख में हर्ष-विषाद नहीं होता है।
इस प्रकार सोचने से असाता की उदीरणा साता रूप हो जाती है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Share this on...
2 Responses
साता/असाता को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए असाता से साता के लिए कर्म में सुख दुःख में हर्ष विषाद नहीं होना चाहिए।
2 Responses
साता/असाता को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए असाता से साता के लिए कर्म में सुख दुःख में हर्ष विषाद नहीं होना चाहिए।
Yeh samta rakhne ke liye ek sutra hai ! Acharya Shri ke charnon me shat shat naman !