उत्तम आकिंचन्य धर्म

“कुछ भी मेरा नहीं” आकिंचन्य और इस भाव का आना आकिंचन्य-धर्म।
भीड़ में रहकर अपने नीड़ में रहना आकिंचन्य।
अनुलोम-विलोम में साँस का ग्रहण और त्याग किया जाता है। पर आकिंचन्य ग्रहण और त्याग के ऊपर।
वियोग और विरोध जन्य अभाव आकिंचन्य नहीं उसमें तो अवसाद होता है, अभाव में विनोद और आनंद आकिंचन्य है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

Share this on...

5 Responses

  1. उत्तम आकिंचन्य का उदाहरण एवं परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में धन,जन, परिवार एवं सम्पत्ति हो, उसको यह कहना कि मेरा,मेरा है,यह आपका नहीं है,न पहिले था,न अब भविष्य में रहेगा, अतः जीवन का कल्याण करने हेतु ममत्व के भाव त्याग करना परम आवश्यक है। अतः अपरिग्रह की भावना, इच्छाओं क्षय करने पर समता में स्थिरता आना आवश्यक है। जीवन में सिर्फ आत्मा, ज्ञान एवं चेतन ही शेष रहेगा। परिवार पर मोह त्यागना आवश्यक है, सिर्फ प़ेम रखना चाहिए।।

    1. किसी से विरोध हो जाने पर उस आदमी से अपन दूर रहते हैं, दूसरे शब्दों में उस आदमी का हमारे जीवन में अभाव हो जाता है।
      इस अभाव को आकिंचन्य धर्म नहीं कहेंगे क्योंकि इसमें तो संक्लेश है।

  2. Iska matlab jo humara virodh karta hai, hume usse bhi doori nahi banani chahiye, virodh ke wajah se ? Yeh clarify karenge, please ?

    1. विरोध में हम ऐसा सोचते हैं ना कि मैं अकेला हूँ दुश्मन भी मेरे साथ नहीं विरोध की वजह से जो आपका आकिंचन्य भाव आया हुआ वह आकिंचन्य भाव नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This question is for testing whether you are a human visitor and to prevent automated spam submissions. *Captcha loading...

Archives

Archives
Recent Comments

September 24, 2026

October 2026
M T W T F S S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031