उत्तम तप धर्म

“इच्छा निरोध: तप:”,
आचार्य विद्यासागर जी कहते थे -> “अपेक्षा निरोध: तप:।”
शरीर की वयस्कता उम्र से, मन की तप से।
तप से रसायन आदि प्राप्त किया जा सकता है जिससे प्रभावना तो होगी, जग की भलाई भी लेकिन आत्मा को रसमयी बनाने के लिए जो प्रताप किया जाता है, उससे जगत का कल्याण।
यदि हर गलती पर बोर्ड में एक कीली लगाएँ, पश्चाताप होने पर निकाल दें फिर भी जो निशान रह जाते हैं उसको लेकर यदि हम परेशान रहते हैं तो वह होगा सच्चा तप।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

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3 Responses

  1. उत्तम तप धर्म में तपस्या और साधना के द्बारा कर्मों की निर्जरा करना परम आवश्यक है ताकि आत्मा निर्मल एवं पवित्र बनाने में समर्थ होगी।आत्म संयम और आत्म शुद्धि के लिए एकासन उपवास मर्यादित होना आवश्यक है। जीवन में अपनी सभी इच्छाओं समाप्त करना आवश्यक है, सिर्फ गुरुजनों एवं भगवान की इच्छाओं का पालन करना परम आवश्यक है। जीवन में इन्द्रियों पर संयम रखते हुए स्वेच्छा से कष्टों सहन करना आवश्यक है ताकि निर्जरा होती रहेगी इसलिए आत्मा को निर्मल एवं पवित्र बनाना परम आवश्यक है।

    1. कीला तो क्रोध,
      निशान… अब क्रोध कर तो नहीं कर रहे लेकिन जो पास्ट में तुमने उसको दुःख पहुँचाया था, उसके जो दाग अभी उसके मन में/ यादें बची हुई है वह।

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