उत्तम सत्य धर्म
चार कषायें जब समाप्त या मंद पड़ जाती हैं तब जीवन में सत्य प्रकट होता है।
जो दिखता है वह सत्य नहीं, ना दिखने वाला ही सत्य है। दिखता है उसका फोटो लिया जाता है, जो नहीं दिखता उसका ऐक्स-रे।
नियति ने दो आंखें इसीलिए दीं ताकि हम गहराई/ अनेकांत दृष्टि से सच्चाई को समझ सकें, एक जिव्हा इसलिए ताकि हम सिर्फ सत्य कहें।
कल्पना सत्य नहीं, साक्षात दर्शन सत्य।
मुनि श्री सौम्य सागर जी




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उत्तम सत्य धर्म का उदाहरण एवं परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु सत्य बोलों,मीठा बोलों, सत्य ऐसा बोलना चाहिए ताकि कटुता पेदा नहीं होना चाहिए। अधिक बोलने की जगह मोन धारण करना परम आवश्यक है। सत्य बाहर से समझने की अपेक्षा अंदर महसूस होना परम आवश्यक है।