सिद्धों के गुण
- सूक्ष्मत्व नामकर्म के अभाव से।
- अवगाहनत्व आयु कर्म के अभाव से।
- अव्याबाध… सुख नहीं गुण प्राप्त हुआ, गोत्र कर्म या वेदनीय कर्म के अभाव से।
- अगुरुलघु… वेदनीय कर्म या गोत्र कर्म के अभाव से।
परमार्थ प्रकाश- टीकानुसार
इसलिए अरिहंत तथा सिद्धों के सुख में अंतर नहीं। कर्म/ नोकर्म अब बाधा नहीं पहुँचाते। चारों शरीर आश्रित, इसलिए शरीर का अभाव होने पर ही प्रकट होते हैं।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8)




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सिद्धों के गुण को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।