आलोचना… स्वयं के दोषों को दूर करना/ दूर करने के लिये।
गर्हा……….. दोषों से घृणा करना।
निंदा……….. बुरा कहना।
तीनों स्वयं के लिये प्रशंसनीय, पर-प्रत्यय नश्वरी*।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
* (दूसरों पर घटित की तो स्वयं तथा दूसरों, दोनों के लिए विनाशकारी)।
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आलोचना आदि दोष का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए स्वयं की आलोचना निंदा एवं घृणा करना परम आवश्यकता है। दूसरों के लिए यह सोच करना उचित नहीं है।
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आलोचना आदि दोष का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए स्वयं की आलोचना निंदा एवं घृणा करना परम आवश्यकता है। दूसरों के लिए यह सोच करना उचित नहीं है।