शुभ… यानी अशुभ से दूर।
लाभ… यानी फायदा –> संसार में धनादि का (धर्म में आत्मकल्याण का)।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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आचार्य श्री विघासागर महाराज जी ने शुभ-लाभ को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए शुभ भाव रखना एवं धर्म में आत्म कल्याण का भाव रखना परम आवश्यकता है।
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आचार्य श्री विघासागर महाराज जी ने शुभ-लाभ को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए शुभ भाव रखना एवं धर्म में आत्म कल्याण का भाव रखना परम आवश्यकता है।