उत्तम त्याग धर्म
जीवन में संयम धारण करने के बाद त्याग के भाव आना चाहिए/ आते ही हैं।
दान के लिए धन संग्रह समझदारी नहीं। यह तो ऐसा ही हो गया कि शांति के लिए पहले हम अशांत हों।
शरीर आदि को पर पर कहते हुए भी हम उसमें तत्पर क्यों रहते हैं !
एक डब्बे में सात डंडियाँ टाइट करके भरी हुई हैं, उल्टा करने पर भी गिर नहीं रहीं हैं। लेकिन एक डंडी को हम निकाल देते हैं तब बाकी छह अपने आप पर गिर जाती हैं। उस डंडी का नाम है “धन”, इसका त्याग करते ही, शरीर/ घर/ पत्नी/ संतान/ मित्र/ शत्रु सब अलग होने लगते हैं।
विचार तो करें…यह धन हम पाप से कमा रहे हैं, पापियों के लिए, पाप में लगाने के लिए!
अब तो इसका सदुपयोग कर अपनी समझदारी का परिचय दें।
मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज



