चेतना

शुद्ध कर्मफल चेतना तो एकेन्द्रिय की ही होती है। त्रस जीवों में कर्मचेतना तथा कर्मफल चेतना दोनों होती हैं परंतु अशुद्ध रूप में। ज्ञानचेतना सिद्ध भगवान के ही, तेरहवें चौदहवें गुणस्थानों में शरीर(नाम कर्म) भी कर्मफल चेतना है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी का हाइकू—
मूलबोध है,
जड़ की जटाओं सी,
मूल भूलते।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान- 26 फ़रवरी)

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4 Responses

  1. चेतना का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए ज्ञान चेतना होना परम आवश्यक है।

  2. Can meaning of the following lines be explained, please :
    ‘मूलबोध है,
    जड़ की जटाओं सी,
    मूल भूलते।’

    1. मूल तो तना है यानी ज्ञानचेतना। कर्मफल चेतना और कर्मचेतना तो जटाओं सी हैं जैसे बरगद के पेड़ में जटाएँ इतनी बढ़ जाती हैं कि मूलतना क्या है, यही भूल जाते हैं।

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