जीवन
जीवन बस यही है, अभी है, न भूत में न भविष्य में। दोनों अनंत (+ अनुबंध = अनंतानुबंधी)।
भविष्य उधारी जैसा, लौट कर वापस आये न आये। सो वर्तमान में अधिकतम सुख लेना है, संज्ज्वलन है – (सत् + ज्ज्वलन) = सत्ता के साथ प्रकाशित।
जीवन लंबा अच्छा नहीं, गहरा अच्छा (लम्बा = वृद्ध + प्रज्ञा = प्रौढ़ (गहरा))।
ब्र. (डॉ. नीलेश भैया)




2 Responses
जीवन का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। जीवन अतीत एवं भविष्य की तुलना करना उचित नहीं है, बल्कि वर्तमान में जीना ही सार्थक होना परम आवश्यक है।
Bahut hi unique soch hai !