लब्धि
सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र, संसार तथा परमार्थ सबके लिये अंतरंग तथा बाह्य हेतु चाहिए।
- क्षयोपशम लब्धि तो जन्म से प्राप्त होती है।
- विशुद्धि लब्धि… विशुद्धि की वृद्धि, कषायों की मंदता से।
- देशना लब्धि भी अंतरंग, बाह्य निमित्त से।
- प्रायोग्य लब्धि तीनों के बाद ही।
इसके बाद कर्म-स्थिति कम-कम होते-होते करण-लब्धि हो जाती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी




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लब्धि का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु विशुद्बी लब्धि होना परम आवश्यक है।