हर व्यक्ति अलग-अलग दावे करते हैं जैसे “मैं पुत्र हूँ”। तब वैसी ही क्रिया शुरू हो जाती है।
कभी मैं “भगवान हूँ”, ऐसा दावा क्यों नहीं किया ?
यदि करते, तो वैसी गुणवत्ता झलकने लगती।
पूरे दिन में ऐसे दावे के साथ जीने का कुछ समय तो निर्धारित कर लो।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
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दावा का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए दावा उस समय करना उचित होगा जब उस पर जब तक उसका ज्ञान होना परम आवश्यक है।
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दावा का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए दावा उस समय करना उचित होगा जब उस पर जब तक उसका ज्ञान होना परम आवश्यक है।