धार्मिक क्रियाएँ तो बहुत लोग बहुत सारी करते हैं पर धर्मात्मा वही जो सुख (पुण्योदय) में दुःखी हो (कि भोगना पड़ रहा है) तथा दुःख (पापोदय) में सुखी हो (कि पाप कर्म कम हो रहे हैं)।
दीपा जैन – अमेरिका
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धर्म/धर्मात्मा को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में धर्मात्मा होने के लिए सुख एवं दुःख में सम भाव रखना आवश्यक है। इसके साथ पुण्य का त्याग करना परम आवश्यकता है। अतः जीवन को पुण्य बनाने का प़यास करना आवश्यक है।
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धर्म/धर्मात्मा को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में धर्मात्मा होने के लिए सुख एवं दुःख में सम भाव रखना आवश्यक है। इसके साथ पुण्य का त्याग करना परम आवश्यकता है। अतः जीवन को पुण्य बनाने का प़यास करना आवश्यक है।