ध्यान / इच्छा
कहते हैं जिसका ध्यान करो वह मिल जाता है, अनुभव कहता है ज़रूरी नहीं।
जैसे दो मित्र एक ही ऑफिस में थे, एक सोचते हुए जाता था… कहीं दुर्घटना घटित न हो जाए और उसके प्राय: दुर्घटना होती थी। दूसरा मित्र सोचता हुआ जाता था ऑफिस में जाकर क्या काम करना है, उसके कभी दुर्घटना घटित नहीं हुई।
ध्यान और इच्छा दोनों विचार हैं पर ध्यान में विचार के साथ विश्वास होता है और इच्छा में विचार के साथ भय।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 अक्टूबर)



