नरक यहीं है
राजर्षि अमोघवर्ष कृत नीति ग्रंथ ‘प्रश्नोत्तर-रत्नमालिका’ से-
“नरक क्या है?”
“जहाँ सब कुछ परवश होकर किया जाता है।”
सुख भी यदि परवश हो, तो सुख नहीं रह जाता। स्ववश दु:ख सहना परवश सुख (जैसे स्वर्ग-सुख) से बेहतर है।
यदि स्ववश कर्मों के फलों को समतापूर्वक सहा जाए, तो दु:ख कम होते-होते समाप्त हो जायेंगे। परवशता का भाव ही नरक है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र 3/4)




One Response
नरक यहीं हैं का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में कर्मो को समता पूर्वक सहन करने से नरक जीवन में दिखाई नहीं देगा। अतः जीवन में मायाचारी से बचना परम आवश्यक है ताकि नरक महसूस नही होगा।