पुरुषार्थ

पुरुषार्थ घातिया कर्मों पर, उसमें भी विशेष रूप से मोहनीय पर काम करता है ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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8 Responses

  1. पुरूषार्थ-चेष्टा का प़यत्न करना पुरुषार्थ है। धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष यह चार प्रकार के कहा गया है। धर्म और मोक्ष प्राप्त करते हैं जबकि धर्म रहित अर्थ और काम पुरुषार्थ मात्र संसार बढ़ाने वाले हैं। जीव के गुणों का घात करनें वाले अर्थात गुणों को ढकने वाले या विकृत करने वाले ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय अन्तराय और मोहनीय इन चार कर्मों को घातिया कर्म कहते हैं। मोहनीय कर्म- जिस कर्म के उदय से जीव हित अहित के विवेक से रहित होता है उसे मोहिनी कर्म कहते हैं।
    अतः पुरुषार्थ घातिया कर्मों पर ही, उससे विशेष रूप से मोहनी पर काम करता है।

    1. ग्रहीत में तो पुरुषार्थ की मुख्य भूमिका है कि हम मिथ्यात्व के निमित्तों से दूर रहें,
      पर अग्रहीत में तो कर्म उदय के वेग में पुरुषार्थ का ज्यादा roll नहीं रह पाता है ।

    1. आयु में पुरुषार्थ अकाल-मरण को टाल सकता है,
      गोत्र में उच्च से उच्च-उच्च या उच्च-नीच,
      नाम में plastic surgery से थोड़ा change,
      वेदनीय में संक्रमण कर सकते हैं ।

    1. “ही” तो झगड़े की जड़ होता ही है ।
      इसीलिए “ही” को निकाल ही दिया ।

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