आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे…
मार्दव धर्म मेज के कोने जैसा है, जिनको गोल कर दिया गया हो।
इससे खुद भी सुरक्षित और अन्य भी।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 27 अगस्त)
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मार्दव धर्म को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अंहकार का त्याग करना परम आवश्यक है, इससे जीवन में सरलता, विऩमता एवं कोमलता आती हैं।
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मार्दव धर्म को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अंहकार का त्याग करना परम आवश्यक है, इससे जीवन में सरलता, विऩमता एवं कोमलता आती हैं।
मार्दव धर्म का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अंहकार का त्याग करना परम आवश्यक है, ताकि सरलता एवं विऩमता आ सकती है।