अब्रह्म पाप भाव है।
मैथुन..चारित्र मोहनी के तीव्र उदय + वेद + राग भाव से होता है (सामान्य मोह भाव जैसे भाई बहन का स्पर्श/ भाव अब्रह्म नहीं)।
अब्रह्म “पर” के साथ तथा अकेले में भी (इसमें जब राग सहन न हो)।
मैथुन भी प्रमत्त योग से ही।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/16)