संसार
साधु और गृहस्थ दोनों संसार में, पर संसार में साधु तथा गृहस्थ में संसार।
गृहस्थ संसार का स्वाद जानता (उसमें आनंद लेता) है, साधु संसार का स्वरूप जानता है, उसके लिये संसार में रहना जरूरी है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
साधु और गृहस्थ दोनों संसार में, पर संसार में साधु तथा गृहस्थ में संसार।
गृहस्थ संसार का स्वाद जानता (उसमें आनंद लेता) है, साधु संसार का स्वरूप जानता है, उसके लिये संसार में रहना जरूरी है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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4 Responses
मुनि श्री सुधासागर महाराज जी ने संसार को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए संसार को बढाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
‘उसके लिये संसार में रहना जरूरी है’;yahan par kiski baat ho rahi hai?Ise clarify karenge,please ?
साधु की बात हो रही थी ना कॉमा लगाकर फिर यह सेंटेंस आया, “इसके लिए संसार में रहना जरूरी है”?
साधु के लिए एप्लीकेबल हुआ न !
Okay.