सबसे करीब हमारी आत्मा, लेकिन करीब रहते हैं दूसरों की आत्मा के।
“स्व” के ऊपर श्रद्धालु ही “पर” श्रद्धालु हो सकता है।
जो ख़ुद सुखी नहीं वह दूसरों को सुखी कैसे रख सकता है!!
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
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सुखी रहने के लिए सर्वप्रथम अपनी आत्मा से संवाद रखना परम आवश्यक है। अपनी आत्मा के कल्याण हेतु स्वयं ही श्रद्बान रखना परम आवश्यक है। इसके अतिरिक्त अपने जीवन की इच्छाओं पर नियंत्रण रखना परम आवश्यक है।
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सुखी रहने के लिए सर्वप्रथम अपनी आत्मा से संवाद रखना परम आवश्यक है। अपनी आत्मा के कल्याण हेतु स्वयं ही श्रद्बान रखना परम आवश्यक है। इसके अतिरिक्त अपने जीवन की इच्छाओं पर नियंत्रण रखना परम आवश्यक है।