Month: February 2026

अरहंत / सिद्ध

अरहंत –> ईश/ ऐश्वरवान/ मोक्षमार्ग के नेता। सामान्य केवली तथा सिद्धों के प्रतिहार्य नहीं होते। उन्हें ईश्वर भी नहीं कहते। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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धार्मिक क्रियायें

टी.वी. आदि के निमित्त से धर्म खूब हो रहा है, तो धर्म का ह्रास कैसे और क्यों कहा ? जितनी धार्मिक क्रियायें हो रही हैं,

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आहार

आहार पर्याप्ति कारण है, आहार संज्ञा कार्य। चिंतन

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चाहत

हम धनादि/ पुत्रादि से ज्यादा अपने को चाहते हैं। जैसे दर्पण को नहीं, उसमें अपने को देखते हैं, दर्पण को तो निमित्त बना लेते हैं।

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पाठ्यक्रम

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने तत्त्वार्थ सूत्र, समयसार आदि के बाद मूलाचार पढ़ाया। आ.श्री की चर्या ही मूलाचार थी (पहले प्रैक्टिकल दिखाए ताकि समझ में

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श्रावक‌ / श्रमण

श्रावक (गृहस्थ) का पैर घर में, मन बाहर। श्रमण (साधु) का पैर बाहर, मन घर (अंतरंग) में। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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मंगल आशीष

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February 3, 2026

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