Month: March 2026
प्रमाद
प्रमाद…. कुशल (मंगलरूप, हितकारी कार्य) में अनादर। प्रमाद से ही व्यसन, व्रतों में दोष। प्रमाद होने पर विकथा आदि होने का नियम नहीं। लेकिन विकथा
सुधार प्रवृत्ति
सामूहिक पूजा करते समय, प्रायः लोग सामग्री पटकते हैं। सलीके से चढ़ायें, तो टेबल/ थाली सुंदर दिखे। सामने वाला बायें पर डाले तो आप दायें
अचित्त
अचित्त सेवन से वातादि दोष नहीं होते हैं। जोड़ों के दर्द में लाभ, खासतौर पर शीतकाल में। अपच भी नहीं। शरीर में हलकापन। सचित्त में
निजता
दूसरा (जैसा) बनने के लिये की खुद/ निजता की हत्या करनी पड़ती है। फिर भी दूसरे तो बन नहीं पाते। दूसरे को आदर/ प्रमुखता देने
ज्ञान
दो अक्षर का (छोटा सा) “ज्ञान”, तीन तीन अक्षरों(बडों) वाले “दर्शन” तथा “चारित्र” के बीच जैसे माता पिता के बीच बच्चा, ताकि उछलकूद न करे।
धर्म / धर्मात्मा
धार्मिक क्रियायें तो बहुत लोग बहुत सारी करते हैं पर धर्मात्मा वही जो सुख (पुण्योदय) में दुःखी हो (कि भोगना पड़ रहा है) तथा दुःख
मन वृद्ध
सब इंद्रियों की अपेक्षा अनिन्द्रिय मन सबसे वृद्ध और महत्वपूर्ण है। वह सब इंद्रियों को अपने अनुसार चलाना चाहता है, जैसे कुछ वृद्ध परिवार के
इच्छा / इज़्ज़त
कुछ बड़ा चाहिये तो जो है उसकी महिमा बढ़ाओ (बखान करो)/ उसके विज्ञापन बनो। जिस धर्म/ व्रतादि से तुम्हारी इज़्ज़त बढ़ी है, तुम उस धर्म/व्रतादि
प्रासुक
प्रासुक…. “प्र”…. प्रगत ( निकल जाना) “असु”…”असवः (प्राण) प्रासुक होने पर स्पर्श, रस, गंध, वर्ण –> बदल जाँय जल गर्म/ उबालने से भी रस से
दुःख का कारण
सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं। दुःख समान कैसे ? क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे
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