श्रुतज्ञान ही स्व(स्वार्थ)-पर(परार्थ) कल्याणक होता है। बाकी चार ज्ञान स्वार्थज्ञान ही हैं।
केवलज्ञान भी जानता है पर उसके द्वारा दिव्यध्वनि नहीं खिरती। इसके लिये अन्य साधनों की ज़रूरत होती है, उससे कहने की शक्ति आती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 44)
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9 Responses
मुनि श्री प़णम्यसागर महाराज जी ने श्रुतज्ञान को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
केवलज्ञान भी बस जानता है, दिव्यध्वनि के लिए जैसा महाराज जी ने कहा और साधनों का प्रयोग होता है। केवलज्ञान के द्वारा दिव्यध्वनि नहीं खिरती तो इससे स्वयं का कल्याण हुआ ना !
9 Responses
मुनि श्री प़णम्यसागर महाराज जी ने श्रुतज्ञान को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
‘उससे कहने की शक्ति आती है।’ Iska meaning clarify karenge, please ?
जैसे केवलज्ञान तो सामान्य केवली को भी होता पर तीर्थंकर प्रकृति के अभाव में दिव्यध्वनि खिरने का सामान्यतः विधान नहीं है।
Okay.
‘केवलज्ञान’ ko ‘स्वार्थज्ञान’ kyun kaha ? Ise clarify karenge, please?
केवलज्ञान भी बस जानता है, दिव्यध्वनि के लिए जैसा महाराज जी ने कहा और साधनों का प्रयोग होता है। केवलज्ञान के द्वारा दिव्यध्वनि नहीं खिरती तो इससे स्वयं का कल्याण हुआ ना !
महाराज जी ने jo कहा wo to श्रुतज्ञान ka part hoga aur स्व-कल्याणक hoga na ? Ise clarify karenge, please ?
श्रुतिज्ञान तो स्व-पर कल्याणक है ही। जो महाराज जी ने कहा वह भी स्व-पर कल्याणक है, उनका भी कल्याण करेगा हमारा भी।
It is now clear to me.