तप
अकर्तृत्व के त्याग रूप चारित्र* में जो उद्योग और उपयोग** होता है/ छल कपट त्याग होता है, उसे तप कहते हैं।…(पृष्ठ.101)
* आलोचना व प्रतिक्रमण दोनों में उपयोग लगा देना।…(पृष्ठ 104)
परिग्रह त्याग में उपयोग लगाना।…(पृष्ठ.105)
पाँचों विनय भी चारित्र में आते हैं क्योंकि जिनका विनय करते हैं उनमें उपयोग लगा रहता है।…(पृष्ठ 106)
** सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप आत्मा के परिणाम।…(पृष्ठ 103)
आचार्य श्री विद्यासागर जी (स्वाध्याय श्री भगवती आराधना- भाग 1)
सान्निध्य आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी




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आर्यिका श्री पूर्णमती माता जी ने तप को परिभाषित एवं उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए तप करना परम आवश्यक है।