प्रवचन को धारण करना प्रवचन-वत्सलत्वम् कहलाता है।
यह चौथे गुणस्थानवर्ती श्रावकों से लेकर मुनियों तक अपनी-अपनी भूमिका में धारण किया जाता है।
वात्सल्य श्रावकों और मुनियों का परस्पर होना चाहिये।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 6/24)
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प़वचन वत्सलत्वम् का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है।
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प़वचन वत्सलत्वम् का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है।