उत्तम आर्जव
पुराणों* में एक कथानक आता है… एक व्यक्ति ने अष्टानिका में नियम लिया कि वह दिगंबर गुरु के दर्शन किए बिना भोजन नहीं करेगा। गुरु आसपास थे नहीं सो उसने एक गरीब व्यक्ति से सौदा किया की वह आठ दिन दिगंबर भेष धारण कर ले तब उसके दर्शन करके वह भोजन कर सकेगा। धन के लालच में वह व्यक्ति मान गया। धीरे-धीरे उसके जीवन में दिगंबर मुनि की क्रियाएं बढ़ती चली गईं। आठवें दिन वह पूरी तरह से दिगंबर मुनि बन गये। उसे स्वर्ण मुद्राएं भेंट की गईं। जो शांति और आनंद पाया था उसके बदले में स्वर्ण मुद्राएं लेने से मना कर दिया और वह हमेशा हमेशा के लिए मुनि बन गए। नकली दिगंबर मुनि पर श्रद्धा करके सेठ ने एक अश्रद्धालु को मुनि बना दिया।
विडंबना, हम में से बहुत सारे लोग असली मुनियों को भी नकली मान के अपना पतन कर रहे हैं।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 28 अगस्त)
* पुराना होकर जो नया बना रहे।



