शिविर समापन समारोह
जीवन विकास के 10 दिवसीय शिविर के समापन पर संबोधन करते हुए कहा… व्यवस्थाएं चुस्त भी, सुस्त भी रहीं पर कुल मिलाकर मस्त रहीं।
अपने को अनाड़ी खिलाड़ी बताते हुए, जिसने ना कोचिंग ली, ना पहले प्रैक्टिस ली,पर अपने सबके विकास के पीछे एक नेपथ्य नायक हैं जो पर्दे के पीछे से सब कुछ संभाल रहे थे जैसे कठपुतली को नाचते समय पीछे कलाकार होता है और उनका नाम है आचार्य श्री विद्यासागर जी।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 7 सितम्बर)




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शिविर समापन समारोह का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए दस दिन में जो सीखने को मिला है, उसके लिए चिंतन करना परम आवश्यक है, ताकि अपने हृदय में उतारने का प़यास करना परम आवश्यक है। इसके उपरांत कल क्षमा मांगने का प़यास करना है, सबसे पहिले जिसके प़ति द्धैष भावना हो उससे मांगना आवशक है, ताकि उत्तम क्षमा वाणी कार्यक़म समाप्त हो सके।